Sunday, July 11, 2010

हृदय विदारक मंजर है!!

हृदय विदारक मंजर है, हर इक हाथ में खंजर है!
कैसा आया अंधड़ है, अब मन की माटी बंजर है!!

क्या साधू क्या संत गृहस्थी क्या राजा क्या रानी !
सबके अर्थ अनर्थ हुए हैं करते सब मन मानी !!

सच्चा कोई मीत नहीं है प्रीत की अब कोई रीत नहीं है !
सच्चाई की जीत नहीं है प्रेम का कोई गीत नहीं है !!

धवल वस्त्र को धारण करके धरती माँ को लुट रहे !
वहशी दरिन्दे कर्णधार बन गिद्धों की नाई टूट रहे !!
देख कर अनदेखा करते अपनी भी कोई चाह नहीं!
धमनियों में पानी बहता रक्त का प्रवाह नहीं !!

सांड तेरी हृदय व्यथा का जहाँ में कोई तौल नहीं !
पशुता भली है अब जहां में इंसानियत का मोल नहीं!!

Saturday, January 9, 2010

इंसानी प्रेम में स्वार्थ है !!

प्रेम शब्द का इंसानों के लिए अलग अलग मतलब है| हर प्रेम में स्वार्थ है !

माँ बाप अपने बच्चों को पाल पोसकर बड़ा करते हैं ये लालसा रहती है की बड़ा होकर सहारा बनेगा|

बुढापे में सेवा करेगा! एक लड़की से लड़का या लड़के से लड़की इसलिए प्रेम करती है की बदले में वो भी उसे प्रेम करे |

मगर एक चिड़िया अपने अण्डों को हिफाजत करके उसमे से निकलने वाले चुज्जों को दाना चुगाकर बड़ा करती है | चुज्जे बड़े होकर उड़ जाते है| चिड़िया को किसी प्रतिफल की इच्छा नहीं !
गाय अपने बछड़े की देख रेख करती है उसे प्रेम करती है बड़ा हो कर बछडा क्या उसकी सेवा करता है?
ये है निस्वार्थ प्रेम ! ऐसा प्रेम ही पुजारी से पूज्य बनाता है | आत्मा से महात्मा बनाता है !!

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